सदा जवान रहने एवम स्वस्थ जीवन की प्राप्ति के लिए 30 आरोग्य-सूत्र । How to be healthy and young forever
आज की इस भाग-दौड़भरी जिन्दगी में अपने आपको स्वस्थ एवम जवान रखपाना अपने आप में एक चुनोती हो गया है। लोग समय से पहले ही अनेको प्रकार की बीमारियों जेसे -मधुमेह,उच्चरक्तचाप,मोटापा,अस्थमा, थोड़े से सफ़र में ही थकान हो जाना, समय से पहले ही सर के बालो का सफेद हो जाना, सेक्स के प्रति अरुचि होना, आँखों के नीचे काले धब्बे आ जाना, दाड़ी के बाल समय से पहले सफ़ेद होना, चेहरे की त्वचा पर झुर्रियां एवम् चेहरा निस्तेज हो जाना आदि अनेक प्रकार की समस्याए आज आम हो गई है और इन सभी समस्याओं का परिणाम युवा अवस्था में ही वृद्धा अवस्था आ जाना है ।
यदि आप में भी 35 साल की उम्र से पहले इस प्रकार के लक्षण आने लगे है तो आप समझ लेना आप जवानी में ही बूढ़े होने लगे है ।
लेकिन यदि आप अपनी दिनचर्या को नियमित रखते है और छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखे और उनका पालन करे तो सुखमय जीवन के साथ-साथ सदेव जवान, सुन्दर, निरोग, शक्ति वर्धक एवम दीर्घ आयु जीवन का आनंद लिया जा सकता है ।
आरोग्य के सूत्र-
- जीवन की स्थिरता के लिए प्रक्रतिक, सात्विक व् सहज प्राप्त अन्न ( भोजन ) सर्वश्रेष्ठ है ।
- शरीर में समता व् प्रश्नता लाने के लिए समुचित रूप से जल का सेवन करना उत्तम है ।
- शरीर में शक्ति व् स्फूर्ति लाने के लिए शाररिक व्यायाम उत्तम उपाय है ।
- समय पर सात्विक व् संतुलित भोजन करना आरोग्य का सबसे बड़ा मंत्र है ।
- पाचन शक्ति के अनुसार भोजन करने से जठराग्नि ( पाचन अग्नि ) की वृद्धि होती है ।
- आवश्यकता से अधिक भोजन करने से अजीर्ण उत्पन्न होता है तथा स्वास्थय की हानि होती है ।
- समय पर भोजन करने से स्वास्थ्य की रक्षा तथा बल की वृद्धि होती है ।
- भोजन के तुरंत पहले एवम तुरंत बाद में पानी पीने से जठराग्नि मंद होती है, भोजन करने के लगभग एक घंटे बाद पानी पीना चाहिए इससे जठराग्नि मजबूत होती है तथा भोजन का पाचन सही प्रकार से हो जाता है
- अधिक मात्रा में ठन्डे पेय पदार्थ पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक छमता कम होती है तथा कफ अधिक मात्र में बनता है ।
- ब्रह्मचर्य का पालन करने से शारीरिक शक्ति एवं आयु की वृद्धि होती है ।
- हस्तमैथुन, मुख्मेथुन, समलेंगिक आदि अप्रक्रतिक मैथुन व् अत्यधिक सम्भोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, जो शरीर में भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर देते है, जिससे युवा मनुष्य भी समय से पहले बुढा होने लगता है ।
- सांसो की दुर्घन्ध, ख़राब पाचन क्रिया, मुख की अस्वस्थता तथा मलाशय के अन्दर उपस्थित विशेले पदार्थो का सूचक है ।
- तनाव व् चिंता बीमारियों को उत्पन्न करती है तथा ह्रदय को कमजोर बनती है ।
- क्रोध व् इर्ष्या पित्त को कुपित करती है जिससे शरीर में विषाक्त पदार्थ उत्पन्न होने लगते है ।
- प्रातः उठकर 2-3 गिलास गुनगुना पानी पियें । गुनगुने पानी में आधे नींबू का रस एवम् एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से विशेष लाभ होता है ।
- सुबहा खाली पेट चाय व् कॉफ़ी का सेवन कभी भूल कर भी ना करें इससे पित्त व् वात की वृद्धि होती है, जो शारीर में कई प्रकार के पाचन सम्बन्धी रोगों का कारण बनती है ।
- शौच करते समय दाँतो को भींचकर रखने से वृद्धावस्था में भी दाँत नहीं हिलते ।
- प्रातः मुँह में पानी भरकर ठन्डे जल से 10-15 बार आँखों में छींटे मारे, नियमित ऐसा करते रहने से आँखे हमेसा स्वस्थ रहती, आँखों पर कभी भी चश्मा नही लगता तथा आँखों के नीचे आये काले घेरे खत्म हो जाते है ।
- नास्ते में हल्का तथा रेशेयुक्त आहार, अंकुरित अन्न, फलों, दूध व् दलिये का इस्तेमाल करें ।
- भोजन के उपरांत कम से कम 10-15 मिनट वज्रासन में बैठे । यदि संभव हो तो रात्रि के भोजन के बाद थोडा टहलें ।
- दिन में कम से कम 8 से 12 गिलास पानी जरूर पियें ।
- खाने के दौरान पानी न पियें । खाना खाने के कम से कम आधा घंटे के बाद ही पानी पियें ।
- जल्द बाजी से खाना न खाये, शांत मन से बेठ करके खाना ग्रहण करें एवम् खाने को खूब चबा-चबा कर खाये ।
- हमेशा शाकाहरी सुपाच्य, सात्विक भोजन ही खाये । फ़ास्ट-फ़ूड, कोल्ड ड्रिंक्स, धूम्रपान, मांस मदिरा का प्रयोग कभी भी न करें ।
- कम खाएं । जीवन जीने के लिए खाएं, न की खाने के लिए जियें । अपने आमाशय का आधा भाग भोजन, चौथाई भाग पानी तथा शेष चौथाई वायु के लिए रखें । देह को देवालय बनाये, कब्रिस्तान नहीं ।
- पानी को हमेशा बैठ कर ही पिए खड़े होकर पानी पीने से घुटने ख़राब हो जाते है उनमे दर्द होने लगता है ।
- मल, मूत्र, छींक आदि के वेगों को कभी नही रोकना चाहिए । वेग रोकने से रोग उत्पन्न होते है ।
- नशीले पदार्थों के सेवन से तन, मन, धन, धर्मं व् आत्मा की हानि एवम् अपनी तथा परिवार की बदनामी होती है।
- जीवन में वाणी, व्यवहार व् विचार के दोषों को दूर करने के लिए तथा जीवन पथ पर आगे बढने के लिए प्रतिदिन सायंकाल या रात्रि शयन पूर्व थोड़ी देर धैर्यपूर्वक आँखे बंद करके आत्मनिरीक्षण करें, और जीवन में अष्टाङ्ग योग को अपनाने के लिए पुरूषार्थ करें ।
- हर परिस्थिति में सदैव प्रसन्न एवम् उत्साहित रहें । उत्साह का परिणाम- सफलता तथा निराशा का परिणाम असफलता होता है ।प्रशन्नता स्वास्थय की सबसे बड़ी कुंजी है । हर रोज खुलकर खिलखिलाकर हँसे । हंसना ही जीवन है । उपरोक्त दी गई जानकारी आयुर्वेद के ग्रंथो और आयुर्वेदाचार्यो द्वारा प्राप्त की गई है | पोस्ट से सम्बंधित कोई भी प्रसन्न होने पर आप comment बॉक्स में लिख कर पूछ सकते है |
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